Legal News: भोजशाला विवाद पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला: एएसआई का 2003 का आदेश रद्द, भोजशाला को माता सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र माना गया


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मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजशाला-कमल मौला मस्जिद विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए भोजशाला परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित किया और इसे राजा भोज कालीन माता वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में मान्यता दी। अदालत ने एएसआई के 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें धार्मिक पूजा-अधिकार को सीमित कर शुक्रवार की नमाज की अवधि दी गई थी।


भोजशाला विवाद पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत कई याचिकाएं और अपीलें एक साथ सुनी गईं, जिनमें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के खंडखंड शामिल हैं। ग्रैन्थ विजय शुक्ला और ग्रैन्थ विजय शुक्ला थे, जिसमें धार स्थित भोजशाला परिसर के बुनियादी ढांचे को शामिल किया गया था प्राचीन एवं ऐतिहासिक स्मारक स्थल एवं स्पेक्ट्रम अधिनियम, 1958 के अंतर्गत “संरक्षित स्मारक” घोषित किया गया।

कोर्ट ने कहा कि असल में ब्रह्माण्ड स्थल वास्तव में है माता वाग्देवी (सरस्वती) का भोजशाला मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था, जिसका संबंध परमार वंश के राजा भोज से है।


एएसआई का 2003 का आदेश रद्द

खण्डपीठ ने भारतीय वैज्ञानिक सर्वेक्षण (एएसआई) 7 अप्रैल 2003 को जारी उस आदेश को रद्द कर दिया गया, जिसके अंतर्गत धार्मिक पूजा-अधिकार सीमित थे और मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।


धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व

कोर्ट ने कहा-

“सरकार का संवैधानिक दायित्व केवल प्राचीन स्मारकों और ऐतिहासिक महत्वों के चित्रों की रक्षा करना ही नहीं है, बल्कि गर्भगृह और आध्यात्मिक महत्व वाली देव प्रतिमाओं की सुरक्षा करना भी है। तीर्थयात्रियों के लिए धन उपलब्ध कराना, कानून-व्यवस्था और पवित्रता बनाए रखना भी राज्य की जिम्मेदारी है।”


क्या था विवाद?

भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को लेकर हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदाय की ओर से अलग-अलग दावे किए गए थे।

2003 के एएसआई आदेश के अनुसार—

  • मुस्लिम समुदाय को प्रत्येक शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज अदा की जाती थी।
  • आस्था को केवल बसंत पंचमी पर पारंपरिक अनुष्ठान करना और मंगलवार को हर सूर्योदय से सूर्योदय तक पूजा करना आवश्यक था।
  • अध्यापिका को केवल फूल और कच्चे चावल चड़ाने की याद थी।

इसी आदेश को विभिन्न पत्रों में चुनौती दी गई थी।


मुख्य प्रश्न: 15 अगस्त 1947 को स्थल का स्वरूप क्या था?

मामले में अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था—

  • “संरक्षित स्मारक” क्या है?
  • स्वतंत्रता के समय अर्थात 15 अगस्त 1947 को इसका धार्मिक स्वरूप क्या था?

ऐतिहासिक और एएसआई सर्वेक्षक का अध्ययन

कोर्ट ने 2024 में एएसआई द्वारा वैज्ञानिक सर्वेक्षक, वीडियोग्राफी, संस्कृत अभिलेख, ऐतिहासिक स्मारक, अभिलेख और स्थापत्य आदिवासियों का विस्तृत परीक्षण किया।

रिपोर्ट में पाया गया-

  • धार परमार शासकों की राजधानी थी।
  • बाद में मुस्लिम शासकों ने मस्जिदों के निर्माण में पूर्व हिंदू पूर्वजों के आदिवासियों का उपयोग किया।
  • स्तंभों, शिलाखंडों और संस्कृत अभिलेखों से यह स्पष्ट होता है कि वहां पहले एक हिंदू मंदिर मौजूद था।
  • यह देवी स्थान सरस्वती की पूजा और संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केंद्र था।

एएसआई ने अपनी वैधानिक देयता को बाध्य नहीं किया है

हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 16 और धारा 21, प्राचीन स्मारक एवं ऐतिहासिक स्थल एवं पिरामिड अधिनियम, 1958 एएसआई का दायित्व था कि वह स्थल की वास्तविक प्रकृति और मूल स्वरूप को प्रदर्शित करे।

लेकिन एएसआई ने ऐसा कुछ नहीं किया और स्थल को “भोजशाला या शानदार मौला मस्जिद” के रूप में अधिसूचित कर दिया।


प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 लागू नहीं होगा

अदालत ने कहा कि इसलिए, यह स्थल 1958 अधिनियम के अंतर्गत संरक्षित स्मारक है प्लेसेज ऑफ वर्शिप (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 4 इसके ऊपर लागू नहीं होती।

इसलिए 1991 के कानून के अनुसार इस स्थल के धार्मिक स्वरूप को स्थायी रूप से निर्धारित करने के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता।


भोजशाला से पहले संरक्षित स्मारक था

खण्डपीठ का मानना ​​था कि 1904 के कानून और बाद में 1951 और 1958 के अधिनियमों के तहत यह स्थल पहले से ही संरक्षित स्मारक था और एएसआई इसका प्रबंधन कार्य कर रहा था।

इस प्रकार, धारा 39(2) के अंतर्गत अहिंसा क्षेत्र संरक्षित स्मारक माना जाएगा।


राजा भोजशाला सरस्वती मंदिर था भोजशाला परिसर

अदालत ने एएसआई की वैज्ञानिक रिपोर्ट, ऐतिहासिक साहित्य, स्थापत्य प्रतीकों और अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सिद्धांतों के आधार पर निष्कर्ष निकाला-

  • मूल संरचना सरस्वती पूजा एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र था।
  • बाद में मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया गया, स्तम्भों को नष्ट कर दिया गया और उसके अवशेषों का उपयोग कर मस्जिद का निर्माण किया गया।
  • वर्तमान संरचना परमार काल मंदिर के ऊपर निर्मित है।
  • राजा भोज काल से संबंधित साहित्य एवं वास्तुशिल्पीय संदर्भ में वहां माता सरस्वती के मंदिर की मान्यता की पुष्टि होती है।

उच्च न्यायालय का निष्कर्ष

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा कि ब्रह्माण्ड स्थल का ऐतिहासिक एवं मूल स्वरूप क्या है भोजशाला, यानी माता सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र था. इसलिए एएसआई ने 2003 में जारी आदेश में कहा था, जिसमें बौद्धों की पूजा-अधिकार सीमित थे और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज की अनुमति दी गई थी, कानून के सिद्धांत नहीं हैं और उन्हें स्थापित नहीं किया गया है।


मामला

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 2026


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