भ्रष्टाचार, मिलीभगत और मौत: एलडीए की आंखों के सामने खड़ा हुआ अवैध कॉम्प्लेक्स, निगल लीं मासूम जिंदगियां

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एलडीए की नाक के नीचे तैयार हुआ ‘मौत का किला’, त्रासदी के बाद अब तय हो रही जिम्मेदारी

लेवाना, विराट और एसएसजे की त्रासदियों से भी नहीं जागा सिस्टम, अलीगंज का गेमिंग सेंटर बना ‘मौत का लाक्षागृह’

लखनऊ। राजधानी लखनऊ में एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी ने मासूम जिंदगियों को निगल लिया। लेवाना होटल, विराट होटल और एसएसजे इंटरनेशनल जैसी दर्दनाक घटनाओं से सबक लेने के बजाय जिम्मेदार विभागों की निष्क्रियता ने अलीगंज स्थित गेमिंग सेंटर को एक ऐसे आधुनिक “लाक्षागृह” में बदल दिया, जहां सुरक्षा मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं और अंततः लोगों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

जानकारी के अनुसार जिस भूखंड पर स्वीकृत मानचित्र के तहत केवल एक आवासीय भवन का निर्माण होना था, वहां नियमों को ताक पर रखकर बेसमेंट सहित तीन मंजिला व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स खड़ा कर दिया गया। यह अवैध निर्माण लंबे समय तक चलता रहा, लेकिन लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के जिम्मेदार अधिकारियों ने आंखें मूंदे रखीं।

त्रासदी के बाद अब एलडीए ने 16 अधिकारियों की भूमिका की जांच शुरू करते हुए उनकी जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू की है। संबंधित रिपोर्ट जिलाधिकारी के माध्यम से शासन को भेजी जा रही है। हालांकि बड़ा सवाल यह है कि जब अवैध निर्माण एक-एक मंजिल बढ़ाकर नियमों का मजाक उड़ा रहा था, तब जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे?

अभिलेख बताते हैं कि एमएस-102 भूखंड वर्ष 1980 में आवंटित किया गया था। बाद में वर्ष 2014 में स्वतः मानचित्र स्वीकृति योजना के तहत भवन का नक्शा स्वीकृत हुआ। इस योजना में स्पष्ट प्रावधान था कि निर्माण केवल स्वीकृत मानचित्र और निर्धारित भू-उपयोग के अनुरूप ही किया जाएगा। किसी भी प्रकार का विचलन होने पर स्वीकृति स्वतः निरस्त मानी जाती है।

इसके बावजूद आवासीय भवन की जगह व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स का निर्माण कर दिया गया। निर्धारित सेटबैक को समाप्त कर लगभग पूरे भूखंड पर निर्माण किया गया। वर्ष 2016 में एलडीए ने स्वयं इस निर्माण को अवैध बताते हुए नोटिस भी जारी किया था, जिससे यह स्पष्ट है कि विभाग को नियम उल्लंघन की जानकारी थी। इसके बावजूद न तो निर्माण रोका गया और न ही कोई प्रभावी कार्रवाई की गई।

भवन निर्माण उपविधियों के अनुसार दो हजार वर्गमीटर से कम क्षेत्रफल वाले भूखंड पर अधिकतम 65 प्रतिशत क्षेत्र में ही निर्माण की अनुमति थी, जबकि 35 प्रतिशत क्षेत्र आपातकालीन निकास, अग्निशमन एवं सुरक्षा व्यवस्थाओं के लिए खुला रखना अनिवार्य था। लेकिन मौके पर लगभग पूरा भूखंड निर्मित पाया गया।

बेसमेंट निर्माण में भी नियमों की अनदेखी की गई। जहां केवल सीमित क्षेत्र में बेसमेंट की अनुमति थी, वहीं वास्तविक निर्माण निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक पाया गया। विशेषज्ञों के अनुसार यह न केवल भवन निर्माण नियमों का गंभीर उल्लंघन है, बल्कि लोगों की सुरक्षा के साथ किया गया एक खतरनाक और आपराधिक खिलवाड़ भी है।

अब जबकि कई परिवार अपनों को खो चुके हैं, जनता यह जानना चाहती है कि क्या केवल कुछ कर्मचारियों के निलंबन से न्याय हो जाएगा? क्या उन वरिष्ठ अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होगी जिनकी निगरानी में यह अवैध निर्माण वर्षों तक फलता-फूलता रहा? क्या उन लोगों पर भी कार्रवाई होगी जिनके संरक्षण के बिना इतना बड़ा अवैध व्यावसायिक ढांचा खड़ा नहीं हो सकता था?

यह सवाल केवल एलडीए से नहीं, बल्कि पूरी शासन व्यवस्था से है। पीड़ित परिवारों को केवल कार्रवाई के आश्वासन नहीं, बल्कि वास्तविक जवाबदेही और दोषियों को कठोर दंड चाहिए, ताकि भविष्य में कोई अन्य इमारत मौत का लाक्षागृह न बन सके।

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