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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी बेटी को उचित मूल्य की दुकान के आधार पर रियायत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) का उल्लंघन करते हुए कहा कि फिल्म की स्थिति के आधार पर भेदभाव लैंगिक रूढ़ियों पर आधारित और असंवैधानिक है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: बेटी को भी दिया ‘परिवार’ का हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अगर कोई वेद बेटी मृत दर दुकान (उचित मूल्य दुकान) पट्टेदार पर श्रमिक और अन्य सभी पात्रता प्रतिबंध पूरी तरह से लागू होते हैं, तो उसे केवल अवकाश स्थिति के आधार पर श्रमिक कोटे का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
पौराणिक आलोक आराधे और पौराणिक पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा के खण्डपीठ ने अल्लाहाबाद हाई कोर्ट, उपजिलाधिकारी (एसडीएम) और उपायुक्त को मंजूरी देते हुए कहा-
“जब निर्भरता (निर्भरता) को पात्रता का मुख्य आधार स्वीकार किया गया है, तब विवाह के कारण बेटी को बाहर करना पूरी तरह से तर्कहीन और योजना के उद्देश्य को विफल करने वाला है।”
कोर्ट ने माना कि बेटी को बाहर रखने की व्यवस्था की जाएगी लैंगिक रुढ़ियाँ (लिंग रूढ़िवादिता) पर आधारित है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(1) का उल्लंघन है।
क्या था मामला?
मामले में आरोपी की मां को साल 2012 में दर की दुकान की इजाजत दी गई थी। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश आवश्यक वस्तु (वितरण एवं वितरण) नियंत्रण आदेश, 2016 लागू।
इसके बाद 5 अगस्त 2019 को राज्य सरकार ने एक सरकारी आदेश जारी किया, जिसमें मृत दर दुकान के सहयोगियों को दुकान खोलने की प्रक्रिया निर्धारित की गई। इस आदेश में “परिवार” की परिभाषा दी गई थी, जिसमें अविवाहित, विधवा और कानूनी रूप से अलग रह रही बेटी को शामिल किया गया था, लेकिन विवाहित बेटी को बाहर रखा गया था।
माँ की मृत्यु के बाद बेटी ने आवेदन किया
4 मार्च 2024 को अपीलकर्ता की मां का निधन हो गया। अपीलकर्ता का कहना था कि वह शादी के बाद भी अपनी मां के साथ उसी गांव में रहती थी और दुकान संचालन में अपनी सहायता करती थी।
उसने यह भी बताया कि वह अपनी चार जनजातियों की देखभाल कर रही थी, जिनमें से एक थी दृष्टि बाधित (दृष्टि बाधित) था।
माँ की मृत्यु के बाद उन्होंने ग़रीब कोट के तहत दुकान के लिए आवेदन किया था, लेकिन उपज़िला अधिकारी ने 16 जुलाई 2024 को केवल इस आधार पर आवेदन को अस्वीकार कर दिया था कि उन्होंने बेटी का विवाह किया है और सरकारी आदेश में “परिवार” की परिभाषा में शामिल नहीं है।
उप आयुक्त ने भी 7 जनवरी 2025 को इस फैसले को तानाशाही पर रखा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपीलकर्ता ने दी थी चुनौती।
उच्च न्यायालय ने अपने सभापति के निर्णय लिये-कुसुमलता और सईदा बेगम—का उधार लिया गया पत्रावली अस्वीकार कर दी गई। हालाँकि, उच्च न्यायालय का मानना है कि विवाहित बेटियों के अधिकार को खत्म करना एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है और इस विषय पर विभिन्न उच्च न्यायालयों के सर्वसम्मति विरोधी निर्णय मौजूद हैं।
इसी कारण मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय।
फिल्म स्थिति पात्रता का आधार क्या हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उफ़ कोट का उद्देश्य मृत दार दुकान विक्रेता के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान करना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की निरंतरता बनाए रखना है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस योजना का उद्देश्य न तो उत्तराधिकार का अधिकार देना है और न ही पारिवारिक वंश के आधार पर कोई विशेष लाभ प्रदान करना है।
इस योजना का वास्तविक उद्देश्य केवल यह देखना है कि मृत व्यक्ति कौन कर्मचारी था और कौन दुकान का संचालन प्रभावशाली रूप से कर सकता है।
विवाह के बाद बेटी परिवार से अलग हो जाती है—यह धारणा असंवैधानिक है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाहित बेटी को आधार के बाहर रखा जा सकता है, इसका आशय यह है कि विवाह के बाद बेटी अपने उद्यम का हिस्सा नहीं रह सकती और उस पर बेटी भी नहीं टिक सकती।
कोर्ट ने इस धारणा को संविधान-विरोधी बताया।
कोर्ट ने कहा कि आज भी कई विवाहित बेटियां अपने माता-पिता के साथ रहती हैं, उनका भरण-पोषण करती हैं या स्वयं उन पर प्रतिष्ठित रहती हैं।
समाजसेवा के प्रश्न पर सहमति नहीं है, न कि केवल अवकाश की स्थिति पर।
औद्योगिक पुत्रों को शामिल किया गया, औद्योगिक पुत्रियों को बाहर रखा गया भेदभावपूर्ण
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि विवाह के बाद भी बेटा परिवार का सदस्य बना रहता है, जबकि बेटी को केवल विवाह के कारण परिवार की परिभाषा से बाहर कर दिया जाता है।
कोर्ट ने कहा कि यह अंतर उस पारंपरिक सोच पर आधारित है कि विवाह के बाद बेटी “दूसरे परिवार” का हिस्सा बन जाती है और सिद्धांत से उसका रिश्ता खत्म हो जाता है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी धारणाएं ऐतिहासिक लैंगिक विचारधाराओं को बढ़ावा दे रही हैं और संविधान प्रदत्त समानता के सिद्धांत के विपरीत हैं।
अनुच्छेद 14 एवं 15(1) का उल्लंघन
कोर्ट ने कहा कि संविधान का सिद्धांत 14 कानून के अनुरूप समानता और समान संरक्षण की अनुमति देता है, जबकि अनुच्छेद 15(1) लिंग के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
कोर्ट ने पाया कि विवादित बेटी को परिवार की परिभाषा से बाहर रखा गया है न तो तारक है और न ही योजना के उद्देश्य से उसका कोई संबंध है।
इसलिए यह व्यवस्था संस्था (मनमाना) और असंवैधानिक है।
‘बेटी’ शब्द का विस्तृत वर्णन
सर्वोच्च न्यायालय ने उद्देश्यपूर्ण व्याख्या (उद्देश्यपूर्ण निर्माण) के सिद्धांत को अपनाते हुए कहा कि 2016 नियंत्रण आदेश में मान्य “बेटी” शब्द का सिद्धांत अन्य तरीकों से नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि यदि कोई विहित बेटी मृत दुकान के मालिक पर कब्जा कर लेती है, स्थानीय निवासियों की शर्त पूरी करती है और अन्य सभी सुविधाओं को पूरा करती है, तो उसे भी “परिवार” का सदस्य माना जाएगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “बेटी” शब्द में बेटी भी शामिल है।
पूर्व के अस्वीकृत कर दिया गया
न्यायालय सर्वोच्च ने इलाहबाद उच्च न्यायालय का निर्णय -विमला श्रीवास्तव के दृष्टिकोण का समर्थन किया गया और बॉम्बे, कर्नाटक और चर्च के चर्चों के निर्णयों से कंसोन्टार स्टेज में कहा गया कि किसी भी पात्र की बेटी को रोजगार योजना के लाभ से शुरू नहीं किया जा सकता है।
साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कुसुमलता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य तथा सईदा बेगम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य विपरीत विचारों में सही कानून नहीं हैं और उन्हें निरस्त (ओवररूल) किया जाता है।
अपीलकर्ता को मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता विवाह के बाद भी उसी गांव में रह रही थी, दुकान संचालन में अपनी मां की सहायता कर रही थी और अपनी प्रेमिकाओं की जिम्मेदारी भी निभा रही थी।
इन दावों का कभी किसी सरकारी संस्थान ने खंडन नहीं किया था।
अंतिम आवेदन को खारिज करने का एकमात्र आधार उसका प्रावधान था और यह आधार असंवैधानिक पाया गया, इसलिए अदालत ने-
- अपील स्वीकार कर ली;
- 16 जुलाई 2024 को वोडाफोन का आदेश रद्द कर दिया गया;
- उप आयुक्त का 7 जनवरी 2025 को आदेश निरस्त कर दिया गया;
- इलिनोइस हाईकोर्ट का 5 मार्च 2025 का फैसला भी रद्द कर दिया गया;
- सक्षम योग्यता को चार सप्ताह के अंदर अपीलकर्ता के पक्ष में दर की दुकान खोलने का निर्देश दिया गया।
निर्णय का महत्व
यह निर्णय केवल दर दुकान तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं के समान अधिकार से संबंधित व्यापक संवैधानिक सिद्धांत को मजबूत करता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि विवाह से किसी महिला की पहचान, पारिवारिक अधिकार या उसकी अधिकारिता समाप्त नहीं होती। किशोरावस्था में मान्यता प्राप्त बेटी को केवल उनकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर संविधान की भलाई की भावना के विपरीत माना जाता है।
मामला: कुलसुम निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
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