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केरल उच्च न्यायालय ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के कई शक्तिशाली देशों, भारत माता और राजनीतिक दलों के नाम पर ली गई शपथ को अवैध घोषित कर दिया। कोर्ट ने चार सप्ताह के भीतर वैधानिक शपथ लेने का निर्देश दिया।
तिरुवनंतपुरम निगम के शपथग्रहण पर सख्त टिप्पणी
केरल उच्च न्यायालय ने तिरुवनन्तपुरम नगर निगम के कई कट्टरपंथियों द्वारा ली गई शपथ को अवैध घोषित करते हुए कहा कि रिहायशी जमीन को कानून द्वारा निर्धारित प्रारूप का ही पालन करना होगा। अदालत ने पाया कि संबंधित समर्थकों ने शपथ लेते समय ईश्वर के नाम या प्रतिज्ञान (गंभीर प्रतिज्ञान) करने के बजाय विभिन्न देवी-देवताओं, धार्मिक प्रतीकों और राजनीतिक धर्मगुरुओं का उल्लेख किया था।
वंहा पी.वी. कुन्हीकृष्णन ने राज्य निर्वाचन आयोग को यह निर्देश देने के लिए याचिका स्वीकार की कि चार सप्ताह के लिए संबंधित राष्ट्रपतियों के लिए शपथ ग्रहण की व्यवस्था की जाए।
न्यायालय ने शपथ को लोकतंत्र घोषित किया
अदालत ने अपने आदेश में कहा:
“याचिका स्वीकार की जाती है। याचिका में प्रतिवादी संख्या 4 से 23 द्वारा ली गई शपथ को अवैध घोषित किया गया है। व्यावहारिक चार सप्ताह के भीतर उन्हें पुनः शपथ दिलाने की आवश्यक व्यवस्था की जाए।”
क्या था विवाद?
कुवैत ने तर्क दिया था कि डेमोक्रेट्स ने केरल नगर दिया केपेलिक अधिनियम, 1994 की धारा 143 में निर्धारित शपथ प्रक्रिया का पालन नहीं किया था। कानून के अनुसार नामांकित प्रतिनिधि या तो “ईश्वर के नाम पर” शपथ ले सकते हैं या फिर “सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञान” कर सकते हैं।
लेकिन कई कलाकारों ने अलग-अलग धार्मिक और राजनीतिक संदर्भों के अर्थ के बजाय शब्दों को रखा।
किन संस्करणों पर ली गई शपथ?
अदालत के समक्ष प्रस्तुत रिकार्ड के अनुसार कुछ किलेदारों ने ओस्टॉल्ट्स का प्रदर्शन करते हुए शपथ ली थी-
- “गुरुदेव के नाम पर”
- “उदय बॉसर देवी के नाम पर”
- “कविलम्मा के नाम पर”
- “भगवती के नाम पर”
- “श्री पद्मनाभ स्वामी के नाम पर”
- “भारत अम्बा के नाम पर”
- “मेरे आंदोलन के बलिदानियों के नाम पर”
- “भारत माता के नाम पर”
- “तिरुवल्लम परशुराम के नाम पर”
- “अट्टुकल अम्मा के नाम पर”
- “श्री इरुमकुलंगरा दुर्गा भगवती के नाम पर”
- “पद्मनाभन और श्री महाविष्णु के नाम पर”
- “श्रीकंठेश्वर स्वामीयप्पन के नाम पर”
- “अयप्पा के नाम पर”
- “कार्यवत्तोम श्री धर्मशास्ता के नाम पर”
राजनीतिक राजनीतिज्ञ और अविश्वासी के नाम पर शपथ पर भी विश्वास
डाकू ने अदालत को बताया कि शपथ का उद्देश्य संविधान के प्रति निष्ठा व्यक्त करना है। इसलिए इसे किसी भी राजनीतिक दल, आंदोलन, संगठन या बलिदानियों से जुड़े कानून और संवैधानिक विचारधारा के विपरीत माना जाता है।
भर्ती में यह भी कहा गया है कि राज्य निर्वाचन आयोग ने पहले ही इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी कर दिया है।
कानूनी स्थापत्य से लेकर वास्तु शास्त्र तक नहीं
उच्च न्यायालय का मानना है कि सलेम को शपथ दिलाते समय वैधानिक दस्तावेजों का पालन करना अनिवार्य है। यदि कानून ने शपथ के लिए एक निश्चित प्रारूप स्थापित किया है, तो इसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि शपथ का उद्देश्य संवैधानिक और कानूनी दायित्वों को स्वीकार करना है, न कि व्यक्तिगत धार्मिक या राजनीतिक मतदाताओं का प्रदर्शन।
पुराने फैसले और कामकाज पर कोई असर नहीं
हालाँकि अदालत ने शपथ को अवैध घोषित कर दिया, लेकिन यह भी स्पष्ट हो गया कि फैसले की तारीख तक बंधकों द्वारा किए गए कार्य सार्वजनिक नहीं होंगे।
अदालत ने केरल नगर पालिका अधिनियम की धारा 531 का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी परिषद, समिति या संस्था की कार्यवाही में केवल इस आधार पर कोई प्रावधान नहीं हो सकता है कि उसके गठन, चुनाव या गठन में कोई तकनीकी खामी या बोर्डिंग प्रक्रिया हो।
निर्णय का व्यापक प्रभाव
यह निर्णय राज्य के स्थानीय स्वशासन शपथ ग्रहण की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि स्वामी को व्यक्तिगत आस्था या राजनीतिक विचारधारा के आधार पर शपथ के वैधानिक ढाँचे में बदलाव करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
मामला
2026 का डब्ल्यूपी(सी) नंबर 1502 | केरल उच्च न्यायालय | निर्णय दिनांक: 24 जून 2026
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