Legal News: ट्रांसजेंडर कानून पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, केंद्र ने सभी याचिकाएं पोस्ट करने की मांग की


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सीजेई सूर्यकांत ने कहा कि कई बार उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण और कानूनी विश्लेषण से सर्वोच्च न्यायालय को भी सहायता मिलती है

न्यायालय सर्वोच्च ट्रांसजेंडर लैंग्वेज (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 में चुनौती चुनौती वाली याचिकाओं पर सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने विभिन्न उच्च न्यायालयों में सहायक मामलों को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की।

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने कोर्ट सुप्रीम से आग्रह किया कि इस कानून को चुनौती दी जाए वाली विभिन्न उच्च न्यायालयों में याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित किया जाए, ताकि एक समान कानूनी दृष्टिकोण सुनिश्चित हो सके।

केस की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और गवर्नर जॉयमाल्या बागची की पृष्टि के समान हुई।

केंद्र ने जल्द ही की मांग की

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से चुराए गए दस्तावेजों को जल्द से जल्द सूचीबद्ध करने की मांग की है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में नोटिस जारी करता है, तो इस बीच उच्च न्यायालयों से कार्यवाही की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

फेटे ने कहा कि केंद्र सरकार ने ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम चुनौती देने वाली याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के लिए आवेदन मांगे जाते हैं और इस पर शीघ्र सुनवाई की आवश्यकता होती है।

“हाई कोर्ट के विचार भी उपयोगी हो सकते हैं”

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि विभिन्न उच्च न्यायालयों में सुनवाई हमेशा के लिए नुकसान देह नहीं होती।

सीजेई सूर्यकांत ने कहा कि कई बार उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण और कानूनी विश्लेषण से सर्वोच्च न्यायालय को भी सहायता मिलती है। उन्होंने टिप्पणी की:

“कभी-कभी हम हाई कोर्ट के दृष्टिकोण का भी लाभ उठा सकते हैं।”

हालांकि सॉलिसिटर जनरल वकील ने दलील दी कि अलग-अलग हाई कोर्ट में सुनवाई से लेकर विरोधाभासी फैसले तक की संभावना बन सकती है।

उन्होंने कहा कि कई उच्च न्यायालय इस मुद्दे पर विचार कर रहे हैं और उनमें समानता हो सकती है।

कोर्ट ने कहा- दोबारा पढ़ें विचार

केंद्र सरकार की चॉकलेट सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हस्ताक्षर किए कि वह इस पर विचार करेंगे।

सीजे ने आकर्षक टिप्पणी करते हुए कहा:

“हम आइटम देखें।”

इस पर अभियोजन अदालत ने कोई अंतिम आदेश जारी नहीं किया है।

ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम, 2026 क्या है?

31 मार्च 2026 को राष्ट्रपति की मंजूरी बैठक के बाद यह संशोधन अधिनियम लागू हुआ, वर्ष 2019 के ट्रांसजेंडर अधिकार कानून में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं।

संशोधन के तहत इस पुनर्परिभाषित में किसे “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” माना जाएगा। इसके अलावा, अंकित लिंग पहचान पहचान दस्तावेज, शारीरिक हिंसा और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़ी सजाएं, नैतिक पेशेवरों को भी और सख्त बनाया गया है।

LGBTQIA+ ने लालची विचारधारा को जन्म दिया

इस संशोधन का कई LGBTQIA+ अनुयायी और अधिकार संरक्षक ने विरोध किया है. उनका कहना है कि नए इंजीनियरों में मान्यता (प्रमाणीकरण की आवश्यकता) की व्यवस्था ट्रांसजेंडर लोगों की गरिमा, निजता और स्वामिता का अधिकार बनी रहती है।

उत्पादों का तर्क यह है कि यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक संशोधन है राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण बनाम भारत संघ (एनएएलएसए) निर्णय की भावना विरुद्ध है।

NALSA मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति को स्वयं अपनी भाषा की पहचान करने का अधिकार को मूल अधिकार माना था।

कई उच्च न्यायालयों में डाक बंगले हैं

इस कानून को चुनौती देने वाली कई नियुक्तियां दिल्ली उच्च न्यायालय और केरल उच्च न्यायालय सहित विभिन्न उच्च न्यायालयों में हैं।

साथ ही, इस मुद्दे पर सीधे सुप्रीम कोर्ट में कुछ याचिकाएं भी उजागर की गई हैं। ऐसे में केंद्र सरकार चाहती है कि सभी मामलों की सुनवाई एक ही मंच पर हो, ताकि पूरे देश में एक जैसा ही धार्मिक निर्णय लागू हो।

संवैधानिक संस्था से संग्रहालय अहम विवाद

यह मामला केवल संवैधानिक या संवैधानिक विवाद नहीं है, बल्कि लैंगिक पहचान, निजता, गरिमा और समानता जैसे संवैधानिक प्राधिकरण से महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है।

आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट के रुख में यह तय किया जा सकता है कि ट्रांसजेंडर लोगों की पहचान और अधिकारों की सुरक्षा को लेकर भारतीय संवैधानिक व्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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