शीर्ष अदालत ने आरोपित को जमानत देते हुए मोबाइल लोकेशन शेयर करने की लगाई शर्त, तकनीक विकास के बढ़ते कदम

Estimated read time 0 min read
  • नशीले पदार्थ रखने के मामले में आरोपित को दी गई जमानत
  • एक अन्य मामले में भी निजता के पहलू से विचार कर रही शीर्ष अदालत

तकनीक के बढ़ते कदम से वर्तमान समय में जांच एजेंसियों के लिए यह पता लगाना आसान हो गया है कि आरोपित अपराध के समय कहां था। इसी को देखते हुए आज आपराधिक न्याय प्रणाली एक कदम और आगे बढ़ता दिख रहा है। अदालतें भी जमानत में आरोपित को जांच अधिकारी से लोकेशन साझा करने का आदेश देने लगी हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने नशीले पदार्थ रखने के एक मामले में जमानत देते हुए आरोपित को आदेश दिया है कि वह जांच अधिकारी के साथ लोकेशन साझा करे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की ही एक अन्य पीठ जमानत के आदेश में लोकेशन साझा करने की शर्त पर विचार कर रही है। उस मामले में कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि जमानत की ऐसी शर्त पहली नजर में निजता के मौलिक अधिकार का हनन कर सकती है।

न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने सुनवाई करते हुए दो नवंबर को नशीले पदार्थ रखने के आरोपित को जमानत देते हुए लोकेशन शेयर करने की शर्त लगाई।

राजस्थान के इस मामले में पीठ ने पूरनमल जाट को जमानत देते हुए आदेश में कहा कि उस पर नशीले पदार्थ रखने के आरोप हैं। उसके पास से 35 किलो और 150 ग्राम डोडा पोस्त (पोपी स्ट्रा) बरामद हुआ। पापी स्ट्रा की व्यावसायिक मात्रा कानून में 50 किलोग्राम बताई गई है। ऐसे में बरामद प्रतिबंधित पदार्थ की मात्रा कानून में में तय व्यावसायिक मात्रा से कम है। इसलिए कानून की धारा 37 में जमानत देने पर लगाया गया प्रतिबंध इस मामले में लागू नहीं होगा।

ALSO READ -  विदेशी दान प्राप्त करना पूर्ण अधिकार नही हो सकता, सुप्रीम कोर्ट ने FCRA कानून में संशोधनों की संवैधानिक वैधता को रखा बरकरार -

कोर्ट ने कहा कि आरोपित सात है महीन से ज्यादा समय से जेल में है। मामले में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है। ऐसी परिस्थिति में नहीं लगता कि आरोपित को ट्रायल के व दौरान लगातार हिरासत में रखा जाना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वे विशेष अदालत की संतुष्टि की शर्तों पर अभियुक्त को जमानत पर रिहा कर दिया जाए। आदेश में कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपित जमानत के दौरान अदालत की इजाजत के बगैर राजस्थान के अलवर जिले के बाहर नहीं जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की एक अन्य पीठ ने अक्टूबर के पहले सप्ताह में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा एक आरोपित को जमानत देते वक्त मोबाइल की गूगल पिन लोकेशन साझा करने के मामले में मौखिक रूप से ऐसी शर्त पर सवाल उठाया था। यह मामला मनी लांड्रिंग का है, जो शक्ति भोग फूड्स लिमिटेड के आंतरिक लेखा परीक्षक म को जमानत दिए जाने से संबंधित ने है। कोर्ट ने जमानत में ऐसी शर्त पर विचार करने से सहमति जताई थी। उस मामले में पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाले ईडी के वकील से कहा था कि आपको हमें ऐसी स्थिति के व्यावहारिक प्रभाव के बारे में बताना चाहिए। एक बार जब कोई व्यक्ति स्वतंत्र हो जाता है, तो कुछ शर्तें लगाई जाती हैं। लेकिन यहां आप जमानत मिलने के बाद उसकी गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं।

क्या यह निजता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है? ईडी के वकील का जवाब था कि पुराने समय में जब जमानत दी जाती थी तो आरोपित को हर सप्ताह जांच अधिकारी को रिपोर्ट करना होता था। यह केवल तकनीक है जो उसी चीज को सुविधाजनक बना रही है।

You May Also Like