Legal News: ज़मानत प्राप्त ही जारी करें सुरक्षा :सुप्रीम कोर्ट ने जारी सख्त निर्देश


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ज़मानत, सज़ा या फांसी के बाद रिहाई की सजा एक ही दिन या ज्यादातर अगले दिन सुनिश्चित की जाए-एससी

न्यायालय सर्वोच्च उन्होंने कहा है कि जमानत, सजा, निलंबन या दफन होने के बाद रिहाई की रिहाई उसी दिन या अधिकतम अगले दिन सुनिश्चित की जाए। अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्याय के अधिकार को मजबूत करने के लिए विस्तृत वारंट जारी किया।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक संवैधानिक अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई विचार करता है कि किसी कैदी को जमानत पर रिहा कर दिया गया है, किसी दोषी को सजा सुनाई गई है या उसे दफन कर दिया गया है, तो उसे रिहा करने में कोई जमानत नहीं होनी चाहिए। अदालत ने निर्देश दिया है कि ऐसे मामलों को उसी दिन रिहा कर दिया जाए या अगले दिन सुनिश्चित किया जाए।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और गवर्नर जॉयमाल्या बागची के खण्डपीठ ने कहा कि कोर्ट से रिहाई मुलाकात के बाद भी बेरोजगारी और संचार में देरी के कारण किसी व्यक्ति को जेल में रखना उसके मूल अधिकारों का उल्लंघन है।

राहत मिलने के बाद भी जेल में रहने की चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कई मामलों में जमानत के आदेश, सजा, निलंबन या सजा के बावजूद कई दिनों तक जेल में रखा जाता है। इसका मुख्य कारण अदालतों, जेल प्रशासन और अन्य संबंधित अधिकारियों के बीच संचार में देरी होती है।

अदालत ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को राहत मिल जाती है, तो स्वतंत्रता में देरी का कारण उसकी स्वतंत्रता पर कायम रहना न्याय का मूल उद्देश्य विफल कर देता है।

ज़मानत आदेश उसी दिन अपलोड करने पर ज़ोर

चर्च ने निर्देश दिए कि जहां तक ​​संभव हो, जमानत याचिकाएं पूरी होने के बाद उसी दिन ऑर्डर करें और उसे तुरंत कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया जाए।

यदि किसी कारणवश ऑर्डर सुरक्षित (आरक्षित) रखा गया है, तो उसे अगले दिन सुनने और अपग्रेड करने का प्रयास करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि तकनीकी और संस्थागत निजीकरण किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा नहीं बन सकता।

जेल प्रशासन को तत्काल सूचना निर्देश का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि उसी दिन संबंधित जेल अधिकारियों और ट्रायल कोर्ट को सजा, सजा, निलंबन या दफन किया जाए।

कोर्ट ने कहा कि विज्ञापन के संचार में देरी से लगातार रिहाई की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे संबंधित अधिकारियों को आदेश की सूचना तत्काल कनेक्शन देना अनिवार्य है।

रिलीज़ में देरी केवल अपवाद स्वरूप

कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि किसी भी कैदी की रिहाई उसी दिन या अधिकतम अगले दिन हो सकती है। हालाँकि कुछ सीमित दायरे में देरी संभव हो सकती है।

के तौर पर, यदि संबंधित व्यक्ति किसी अन्य आपराधिक मामले में भी वैध हो या जमानतदार हो, तो वास्तविक कानूनी बाधा हो, तो ऐसी स्थिति में देरी की जा सकती है।

विश्लेषण रिपोर्ट होगी

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि प्रभावशाली वैज्ञानिक के लिए पर्यवेक्षक तंत्र भी स्थापित किया गया है। अदालत ने संबंधित ट्रायल कोर्ट को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि रिलीज एसोसिएटेड ऑर्डर का पालन किया जाए या नहीं।

इसके लिए ट्रायल कोर्ट को बैस्ट रिपोर्ट दी जाएगी, जिसे हाई कोर्ट बेंच को भेजा जाएगा, संबंधित आदेश जारी किया गया है। इससे विध्वंस के उपकरण पर मंदिर के संरक्षक बने रहेंगे।

रॉकेट में देरी पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती की

यह महत्वपूर्ण निर्देश पिला पाहन @ पीला पाहन एवं अन्य। बनाम झारखंड राज्य और अन्य। मामले में जारी किये गये हैं.

जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों द्वारा सुरक्षित (आरक्षित) होने के कारण जजमेंट सुनाने में वाली देरी पर भी चिंता जताई। अदालत ने निर्देश दिया कि किसी भी मामले में आम तौर पर तीन महीने में फैसला सुनाया जाना चाहिए।

साथ ही, अदालत ने बिक्री और परामर्श के लिए समय-निर्धारण अपलोड, पिज्जा और शीट सुनिश्चित करने के लिए व्यापक आदेश भी जारी किए हैं।

आलेख 21 की भावना को मजबूत बनाता है निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के आवंटन 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल आतिथ्य की डिग्री अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक परंपरा के तहत प्रभावशाली और संविधान से जुड़े संप्रदाय तक भी विशेषाधिकार होता है।

अदालत का मानना ​​था कि यदि कोई व्यक्ति जेल में रखे गए अवशेषों के बाद भी रिहाई की सजा काटता है, तो यह उसके मौलिक अधिकार का हनन होगा।

न्याय व्यवस्था में दुकान और दुकान की दिशा में कदम

कानूनी विशेषज्ञ का मानना ​​है कि यह निर्णय भारतीय न्याय प्रणाली में फर्नीचर, फर्नीचर और शोरूम को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि अदालत द्वारा दी गई राहत केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका लाभ वास्तविक रूप से संबंधित व्यक्ति से लेकर समय तक पूरे देश में है। साथ ही यह भी सुनिश्चित होगा कि किसी भी नागरिक को स्वतंत्रता से स्वतंत्रता न मिले।

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