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बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के अनुसार, हर तीन में से एक वकील फ़र्ज़ी है
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया को आधार जैसी नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री बनाने की मांग वाली याचिका के लिए यूनेस्को के वकीलों से जवाब मांगा है। बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया का दावा है कि देश में हर तीन साल में एक वकील फर्जी है।
नई: दिल्ली देश में कट्टरपंथियों के कट्टरपंथियों और फर्जी वकीलों की बहुसंख्यक संख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई), यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) और अन्य सितारों से जवाब तलब के आधार पर एक राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री बनाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई की।
हर वकील के लिए यूनिक डिजिटल पहचान नंबर होगा
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और रॉबर्ट वी. मोहन की पृष्ण ने कहा कि यह विचार नवीनता की ओर ले जाता है और इसे आधुनिक तकनीक की सहायता से लागू किया जा सकता है।
प्रस्तावित डिजिटल रजिस्ट्री के अंतर्गत प्रत्येक नामित को एक विशिष्ट राष्ट्रीय अधिवक्ता पहचान संख्या (विशिष्ट राष्ट्रीय अधिवक्ता पहचानकर्ता) दे दूँगा। इसका उद्देश्य ग़ैरकानूनी वकील और अवैध रूप से अभ्यास करने वालों पर प्रभावशाली प्रभाव डालना है।
बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने एक आर्किटेक्चरल पोस्ट निकाली है
यह फाइल बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) की ओर से भुगतान किया गया है। गैंगस्टर का दावा है कि देश में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा गंभीर अतिक्रमण किया गया है और हर तीन में से एक वकील कथित रूप से फर्जी है।
बी होटल की ओर से नामांकित नायर और प्रशांत कुमार ने कोर्ट में पक्ष रखा।
डिजिटल आचार संहिता बनाने की भी मांग
दाखिल-खारिज में बार काउंसिल ऑफ इंडिया को कट्टर अधिनियम, 1961 की धारा 49 के तहत इंटरनेट मीडिया और डिजिटल मंच से जुड़े मामलों के लिए एक डिजिटल आचार संहिता (डिजिटल आचार संहिता) बनाने का निर्देश भी मांगा गया है।
ग्रेटर का कहना है कि वैकल्पिक डिजिटल दौर में वकीलों के आचरण और ऑफ़लाइन चोरी के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश आवश्यक हैं।
केंद्र, बीसीआई और यूजीसी ने जारी किया नोटिस
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार, काउंसिल बार ऑफ इंडियाविश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और अन्य संबंधित सितारों को नोटिस जारी कर अपना उत्तर भुगतान करने को कहा गया है।
मामले को जुलाई में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
लॉ मैजिस्ट्री को भी जोर से बनाने की सलाह दी जाती है
श्रवण के दौरान पीठ ने यह भी कहा कि इस मामले में वकालत करने वालों को भी जाना चाहिए, क्योंकि डिजिटल शिक्षा और पंजीकरण व्यवस्था से उनका सीधा संबंध है।
इस पर बी होटल की ओर से कहा गया है कि अनुदान विश्वविद्यालय आयोग (यूजीसी) को सबसे पहले ही आवेदन पत्र में पक्षकार का भुगतान किया जाना है।
प्रौद्योगिकी के लिए अधिकृत वकीलों पर रोक लगाई जा सकती है
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में संकेत दिया गया है कि भविष्य में डिजिटल डिजिटल आर्काइव्स के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल डिक्री तैयार की जा सकती है, जिससे उनकी शैक्षणिक योग्यता, नामांकन और पेशेवर पहचान की मान्यता आसान हो जाएगी।
यदि यह व्यवस्था लागू होती है, तो दोषी वकीलों की पहचान करना और दिवालियापन में कमी की दिशा में सुधार करना एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
मामला: बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य।
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